Nirjala Ekadashi Vrat Katha in Hindi: क्यों कहा जाता है निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी? जानें पूरी कथा और व्रत का महत्व

Nirjala Ekadashi Vrat Kath

Nirjala Ekadashi Vrat Katha: निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी या पांडव एकादशी भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस एक व्रत का पुण्य वर्षभर आने वाली सभी एकादशियों के बराबर माना जाता है। इसकी कथा महाभारत काल से जुड़ी हुई है, जिसमें महर्षि वेदव्यास ने भीमसेन को इस व्रत का महत्व बताया था।

निर्जला एकादशी की कथा

एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने महर्षि वेदव्यास से पूछा कि ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी का क्या महत्व है और इस दिन व्रत कैसे किया जाता है। इस व्रत का सही विधान और इससे मिलने वाले पुण्य का क्या फल है।

युधिष्ठिर के प्रश्न के दौरान भीमसेन ने महर्षि व्यास से कहा कि उनसे नियमित रूप से एकादशी का उपवास नहीं हो पाता। उन्होंने विनम्रता से कहा कि उनके शरीर में भूख की अग्नि इतनी प्रबल रहती है कि वे एक समय भोजन करके भी नहीं रह सकते। ऐसे में पूरे दिन का उपवास करना उनके लिए अत्यंत कठिन है।

भीमसेन ने महर्षि व्यास से अनुरोध किया कि उन्हें ऐसा कोई एक व्रत बताया जाए, जिसे वर्ष में केवल एक बार करने से सभी एकादशी व्रतों का पुण्य प्राप्त हो जाए और उनका भी कल्याण हो सके।

व्यासजी ने बताया निर्जला एकादशी का उपाय

भीमसेन की बात सुनकर महर्षि वेदव्यास ने कहा कि यदि तुम स्वर्ग की प्राप्ति चाहते हो और पापों से मुक्ति चाहते हो, तो ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी का व्रत करो। इस दिन बिना अन्न और बिना जल ग्रहण किए भगवान विष्णु की आराधना करने से पूरे वर्ष की सभी एकादशियों का फल प्राप्त होता है। जो व्यक्ति इस दिन अन्न ग्रहण करता है, वह व्रत का पूर्ण फल प्राप्त नहीं कर पाता। इसलिए श्रद्धा और नियम के साथ निर्जला उपवास करना चाहिए।

निर्जला एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा के बाद अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान करना अत्यंत शुभ माना गया है। इस दिन विशेष रूप से जल से भरा घड़ा, शक्कर, वस्त्र, अन्न, छाता, कमंडल, शय्या, आसन, गौ तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान करने की परंपरा बताई गई है। मान्यता है कि इन वस्तुओं का दान करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और पुण्य की प्राप्ति होती है।

जो श्रद्धालु निर्जला एकादशी के दिन भगवान विष्णु का पूजन करता है और नियमपूर्वक व्रत का पालन करता है, उसे विशेष पुण्य प्राप्त होता है। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत का प्रभाव केवल व्रती तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके पूर्वजों और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी कल्याणकारी होता है।

महर्षि वेदव्यास ने भीमसेन को बताया कि एकादशी के सूर्योदय से लेकर द्वादशी के सूर्योदय तक अन्न और जल का त्याग करना ही इस व्रत का मुख्य नियम है। केवल आचमन के लिए आवश्यकता अनुसार थोड़ा जल ग्रहण किया जा सकता है। द्वादशी के दिन प्रातः स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। इसके बाद जल से भरा कलश, दक्षिणा और दान देकर ब्राह्मणों का सम्मान करना चाहिए तथा विधि-विधान से व्रत का पारण करना चाहिए।

महर्षि वेदव्यास के उपदेश को सुनने के बाद भीमसेन ने प्रत्येक वर्ष निर्जला एकादशी का व्रत करने का संकल्प लिया। तभी से इस एकादशी को भीमसेनी एकादशी और पांडव एकादशी के नाम से भी जाना जाने लगा। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और नियम के साथ किया गया यह व्रत व्यक्ति को पापों से मुक्ति दिलाता है।